चारो तरफ बर्फ की गहरी चादर फैली हुयी थी ,लोग अपनी अपनी रजाइयों में दुबके खुद को गर्म रखने का प्रयास कर रहे थे ,पर ओलिविआ अपने छोटे से बर्फ के घर में अपनी माँ के आग जलाने के अथक परिश्रम को अपलक देख रही थी ,माँ के चेहरे पर नीद और आग के ना जल पाने के कारण गहन उदासी की रेखाएं दिख रही थी ,ओलिविआ को पता था की अगर आग न जली तो शायद सुबह तक वो अपने भाई बहनो के साथ बर्फ बन जाएगी ,बर्फीली हवाओ का शोर अंदर आ रहा था , लकड़ियाँ पूरी तरह ओस से भीगी हुयी थी ,और सूखी लकड़ियाँ घर के बाहर बने सामान घर में थी ,पर इस समय बाहर निकलना मौत को दावत देना ही था , ओलिविआ का दिमाग तेज़ी से काम कर रहा था ,इस ठंड में शिकारी जंगली बर्फानी भालू भी घरो के बाहर अपनी भूख शांत करने के लिए टोह लगाए बैठे होते है। ओलिविआ ने आग जलाने का फैसला कर लिया था ,माँ निढाल हो कर भाई बहनो के बीच दुबक गयी थी ,आखिरी माचिस की तीली भी जल कर खत्म हो चुकी थी ,गहन सोच में डूबी ओलिविआ को अचानक अपनी पुस्तक में पढ़ा पाठ याद आ गया ,की किस तरह जंगल में खो जाने के कारण एक शिकारी ने लकड़ी की मदद से ही आग जला कर खुद को जंगली जानवरो और बेतहाशा ठंड से बचाया था,ओलिविया ने बिना एक पल गवाए लकड़ी की छोटे टुकड़े को उठाया और उसके आस पास सूखे कागज़ो के टुकड़े रख लकड़ी को घिसना शुरू किया लगातार घर्षण से लकड़ी गर्म तो होने लगी थी पर ,छोटी सी ओलिविआ अब थक रही थी तभी उसकी नज़र बेलन पर पड़ी और वो मुस्कुरा उठी उसने लकड़ी को एक धागे से बांध केर बेलन के ऊपर लपेटा और एक सिरा खिड़की के दरवाज़े पैर बांध दिया हवस खिड़की ज़ोर ज़ोर से हिल रही थी और छोटी सी लकड़ी में तेज़ी से घर्षण हो रहा था ,और ५ मिनट में ही लगातार तेज़ घर्षण के कारण लकड़ी में धुआँ निकलने लगा और फिर आग की लपट उठी और कागज़ जलने लगे ,ओलिविआ ने आग के चारो तरफ और कागज़ रख दिए और साड़ी लकडियाँ भी ,५ मिनट में ही लकड़ियाँ सुख गयी और ओलिविया ने चूल्हे में बढ़िया तेज़ आग जला दी ,पूरा घर गर्म हो चुका था ,सब आराम से सो रहे थे ,माँ के चेहरा पे मुस्कान थी ,ओलिविया ने उस रात अपने परिवार को अपनी तीव्र स्मरण शक्ति और आत्मबल के कारण जीवन दान दिया था। ओलिविआ ने हमे सिखाया की यदि ,मुश्किल समय पर यदि हम हिम्मत न हारे और अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल धैर्यता से करे तो कोई भी काम असंभव नहीं है।
shikha
No comments:
Post a Comment