परी की तपस्या
बहुत समय पहले की बात है ,सूर्य नगर में राज्य मंदिर के पुजारी की एक बेटी थी जिसका नाम था विद्या ,विद्या नाम केव अनुरूप ही सर्व गुण संपन्न थी ,और भगवान् की परम भक्त भी थी ,एक बार विद्या जब सूर्य को जल चढ़ा रही थी उसने देखा की दूर आसमान में एक बहुत ही खूबसूरत स्त्री उड़ती हुयी चली जा रही है ,
विद्या ने इस प्रकार उड़ती हुयी स्त्री पहले कभी नहीं देखि थी ,उसने सोचा की मुझे इतनी विद्याये आती है पर आज तक मुझे ये आस्मां में उड़ने की विद्या के बारे में किसी ने नहीं बताया ,और इसीलिए मैं इस विद्या में कच्ची हूँ ,और किसी भी तरह ये विद्या मैं सीखना चाहती हूँ ,और इस प्रकार मन में सोच कर अपने पिता राज्य के प्रमुख पुजारी विद्यानंद जी का इंतज़ार करने लगी।
शाम को पिता के आते ही विद्या ने पिता जी को अपने देखे हुए पूरे अनुभव को बताया ,और स्वयं भी उड़ने की इच्छा जताई और ये विद्या सीखने की ज़िद करने लगी ,पुजारी ने उसे लाख समझाया की वह कोई विद्या नहीं है ,वह तो परी है ईश्वर से उन्हें इस तरह उड़ने की शक्ति मिली हुयी होती है.
पर विद्या ना मानी तो उसका मन रखने के लिए पुजारी जी ने कहा की ठीक है मैं तुम्हे बताता हूँ :":सुनो उसके लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है तेज़ धूप,बरसात , भूख प्यास सब कुछ छोड़ के जंगल में सालो तपस्या करने के पश्चात् अगर प्रभु खुश होते है तो ये वरदान मिल पता है"
पुजारी ने सोचा की विद्या ये सब सुन कर डर जाएगी और अपना इरादा छोड़ देगी पर ,अगले दिन सुबह विद्या घर से चली गयी और शगुन पर्वत पर बैठ कर तपस्या में लींन हो गयी ,पुजारी ने उसे बहुत संमझाया पर विद्या ने अपनी ज़िद ना छोड़ी और ,
पिता से कहा : "पिता जी मैं तप कर के उड़ने वाले पंख ले कर ही घर आऊंगी ,"
आखिर पिता ने विद्या को उसके हाल पर छोड़ दिया और घर वापस आ गए।
इधर समय गुजरने लगा विद्या भूख प्यास सब भूल के आधी तूफ़ान धूप की परवाह किये बगैर कठिन तपस्या में लीं थी ,इधर परियों की रानी को जब ये पता चला तो वह बहुत परेशां हो गयी और सोचने लगी की अगर भगवान् ने खुश हो कर विद्या को वरदान दे दिया तो ,परियों की जाती का मान ही खत्म हो जायेगा जो चाहेगा तपस्या कर परी की भांति शक्ति प्राप्त कर लेगा।
इसलिए उन्होंने विद्या की तपस्या को भंग करने के लिए ,जादुई जानवरो को उसे डराने भेजा पर विद्या ने आंखे ना खोली ,फिर उन्होंने विद्या पर अग्नि वर्षा करी ,विद्या तब भी विचलित ना हुयी ,अब रानी खुद ही विद्या की तपस्या भंग करने गयी ,रानी को पता था की विद्या बहुत दयालु है इसलिए रानी ने एक बुढ़िया का वेश बनाया और विद्या के सामने बैठ कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी : अरे विद्या ,मेरी रक्षा करो मैं भूख से बेहाल इस जंगल में अकेली हूँ ,मेरे दोनों पैर भी टूट गए है,बेटी यदी शीघ्र पानी ना मिला तो मैं जरूर मर जाउंगी. "
वही हुआ
दयालु विद्या के कान में ये आवाज़ आते ही वो अपनी तपस्या के बारे में भूल गयी वह तुरंत उठ खड़ी हुयी और बोली ,: माँ धैर्य रखो मैं तुरंत तुम्हारे लिए पानी खोज के लाती हूँ "
परी बोली : पर बेटी तुमने अपनी तपस्या तोड़ दी ,इतने दिन इतनी कठिन तपस्या की और सिर्फ मेरी मदद के लिए तोड़ दिया"
विद्या बोली : माँ ऐसे पंखो को ले के भी क्या फायदा जब मेरे सामने ही कोई प्राण त्याग दे ,और मैं मदद तक ना कर पाऊ "
परी विद्या की बातो से बहुत प्रस्सन हुयी और बोली :बेटी मैं परी हूँ,और मैंने देख लिया है की तुम्हारे अंदर परी बनने के सभी गुन मौजूद है,मैं तुम्हे वरदान देती हु ,तुम जब मेरा स्मरण कर के उड़ना चाहोगी उड़ सकोगी ,हमेशा सबका भला करना "
विद्या बहुत खुश हुयी और परी का स्मरण कर अपने घर की और उड़ चली ,उसने अपने शक्ति से वो पा लिया था जो वो पाना चाहती थी ,और अपनी इस अनोखी शक्ति से सबकी मदद करने लगी।
बहुत समय पहले की बात है ,सूर्य नगर में राज्य मंदिर के पुजारी की एक बेटी थी जिसका नाम था विद्या ,विद्या नाम केव अनुरूप ही सर्व गुण संपन्न थी ,और भगवान् की परम भक्त भी थी ,एक बार विद्या जब सूर्य को जल चढ़ा रही थी उसने देखा की दूर आसमान में एक बहुत ही खूबसूरत स्त्री उड़ती हुयी चली जा रही है ,
विद्या ने इस प्रकार उड़ती हुयी स्त्री पहले कभी नहीं देखि थी ,उसने सोचा की मुझे इतनी विद्याये आती है पर आज तक मुझे ये आस्मां में उड़ने की विद्या के बारे में किसी ने नहीं बताया ,और इसीलिए मैं इस विद्या में कच्ची हूँ ,और किसी भी तरह ये विद्या मैं सीखना चाहती हूँ ,और इस प्रकार मन में सोच कर अपने पिता राज्य के प्रमुख पुजारी विद्यानंद जी का इंतज़ार करने लगी।
शाम को पिता के आते ही विद्या ने पिता जी को अपने देखे हुए पूरे अनुभव को बताया ,और स्वयं भी उड़ने की इच्छा जताई और ये विद्या सीखने की ज़िद करने लगी ,पुजारी ने उसे लाख समझाया की वह कोई विद्या नहीं है ,वह तो परी है ईश्वर से उन्हें इस तरह उड़ने की शक्ति मिली हुयी होती है.
पर विद्या ना मानी तो उसका मन रखने के लिए पुजारी जी ने कहा की ठीक है मैं तुम्हे बताता हूँ :":सुनो उसके लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है तेज़ धूप,बरसात , भूख प्यास सब कुछ छोड़ के जंगल में सालो तपस्या करने के पश्चात् अगर प्रभु खुश होते है तो ये वरदान मिल पता है"
पुजारी ने सोचा की विद्या ये सब सुन कर डर जाएगी और अपना इरादा छोड़ देगी पर ,अगले दिन सुबह विद्या घर से चली गयी और शगुन पर्वत पर बैठ कर तपस्या में लींन हो गयी ,पुजारी ने उसे बहुत संमझाया पर विद्या ने अपनी ज़िद ना छोड़ी और ,
पिता से कहा : "पिता जी मैं तप कर के उड़ने वाले पंख ले कर ही घर आऊंगी ,"
आखिर पिता ने विद्या को उसके हाल पर छोड़ दिया और घर वापस आ गए।
इधर समय गुजरने लगा विद्या भूख प्यास सब भूल के आधी तूफ़ान धूप की परवाह किये बगैर कठिन तपस्या में लीं थी ,इधर परियों की रानी को जब ये पता चला तो वह बहुत परेशां हो गयी और सोचने लगी की अगर भगवान् ने खुश हो कर विद्या को वरदान दे दिया तो ,परियों की जाती का मान ही खत्म हो जायेगा जो चाहेगा तपस्या कर परी की भांति शक्ति प्राप्त कर लेगा।
इसलिए उन्होंने विद्या की तपस्या को भंग करने के लिए ,जादुई जानवरो को उसे डराने भेजा पर विद्या ने आंखे ना खोली ,फिर उन्होंने विद्या पर अग्नि वर्षा करी ,विद्या तब भी विचलित ना हुयी ,अब रानी खुद ही विद्या की तपस्या भंग करने गयी ,रानी को पता था की विद्या बहुत दयालु है इसलिए रानी ने एक बुढ़िया का वेश बनाया और विद्या के सामने बैठ कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी : अरे विद्या ,मेरी रक्षा करो मैं भूख से बेहाल इस जंगल में अकेली हूँ ,मेरे दोनों पैर भी टूट गए है,बेटी यदी शीघ्र पानी ना मिला तो मैं जरूर मर जाउंगी. "
वही हुआ
दयालु विद्या के कान में ये आवाज़ आते ही वो अपनी तपस्या के बारे में भूल गयी वह तुरंत उठ खड़ी हुयी और बोली ,: माँ धैर्य रखो मैं तुरंत तुम्हारे लिए पानी खोज के लाती हूँ "
परी बोली : पर बेटी तुमने अपनी तपस्या तोड़ दी ,इतने दिन इतनी कठिन तपस्या की और सिर्फ मेरी मदद के लिए तोड़ दिया"
विद्या बोली : माँ ऐसे पंखो को ले के भी क्या फायदा जब मेरे सामने ही कोई प्राण त्याग दे ,और मैं मदद तक ना कर पाऊ "
परी विद्या की बातो से बहुत प्रस्सन हुयी और बोली :बेटी मैं परी हूँ,और मैंने देख लिया है की तुम्हारे अंदर परी बनने के सभी गुन मौजूद है,मैं तुम्हे वरदान देती हु ,तुम जब मेरा स्मरण कर के उड़ना चाहोगी उड़ सकोगी ,हमेशा सबका भला करना "
विद्या बहुत खुश हुयी और परी का स्मरण कर अपने घर की और उड़ चली ,उसने अपने शक्ति से वो पा लिया था जो वो पाना चाहती थी ,और अपनी इस अनोखी शक्ति से सबकी मदद करने लगी।
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